एक
चार छह बीघे का मालिक किसान. जमीन अधिग्रहण में वह चली जाती है. वह विरोध
करता है. वह कहता है कि मुझे मेरी संपत्ति चाहिए. बाकी कुछ नहीं. उसकी कोई
नहीं सुनता. वह विरोध में मुआवजा लेने से मना करता है. कोई ध्यान नहीं
देता. उसका विरोध निष्प्रभावी रहता है. वह उकता कर आत्महत्या कर लेता है.
पेड़ से लटककर. उसके तीन बच्चे और पत्नी अनाथ हो जाते हैं. अधिकारी कहते
हैं कि अभी भी उसके पास एक बीघा खेत बचा था. उसे
मुआवजा भी दिया गया था. उसने नहीं लिया तो उसकी गलती है. उसकी आत्महत्या
एक साइकिल एक्सीडेंट से भी कम महत्व पाती है. यह वही देश है जहां साठ फीसदी
लोग खेती पर निर्भर हैं. लेकिन एक किसान का पेड़ से लटक जाना किसी को असहज
नहीं करता. लेकिन एक फोकट का सेलिब्रिटी अपनी अमीरी से मर जाता है तो लोग
आरआईपी लिखकर नौटंकी करते हैं. मौत सबकी मौत है लेकिन यहां मौत पर भी महत्व
बाजार के आधार पर मिलता है. क्या आपको मालूम है कि यहां की कृषि नीतियों,
बैंक कर्ज और खेती पर कंपनी राज ने पांच साल में करीब पांच लाख किसान लील
लिए हैं? नहीं. क्योंकि पांच लाख किसानों की मौतें एक सस्ते सेलिब्रिटी की
मौत से सस्ती हैं. किसानों का खुदकुशी कर लेना साइकिल एक्सीडेंट जैसा है
जिनमें सभ्याताओं का ध्वंस छुपा है.
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